अजरबैजान (Azerbaijan) से आई यह खबर सिर्फ स्कूल यूनिफॉर्म में बदलाव की नहीं, बल्कि इस सवाल की भी है कि धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आखिर किसी देश में स्कूल का ड्रेस कोड तय करने का अधिकार कहां तक जाता है, और किसी छात्रा की अपनी पसंद की सीमा कहां से शुरू होती है?
सबसे पहले समझिए कि नियम बदला क्या है
21 सितंबर 2026 को अजरबैजान (Azerbaijan) के मंत्रिमंडल ने सरकारी स्कूलों की यूनिफॉर्म से जुड़े नियमों में संशोधन किया। नए प्रावधान के मुताबिक, ऐसे कपड़ों की अनुमति नहीं होगी जो निर्धारित यूनिफॉर्म की एकरूपता बिगाड़ें या सामान्य शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप न हों। इसके बाद 6 अक्टूबर को सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों के पहनावे को लेकर भी अलग नियम तय किए गए। इन आदेशों में हिजाब का नाम सीधे तौर पर नहीं लिखा गया, लेकिन इनके लागू होने के बाद कुछ स्कूलों में हिजाब पहनने वाली छात्राओं और महिला शिक्षकों को रोकने की खबरें सामने आईं। यानी नियम की भाषा सामान्य है, लेकिन उसका असर खास तौर पर हिजाब पहनने वाली महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि अगर मकसद सिर्फ एक जैसी यूनिफॉर्म सुनिश्चित करना है, तो क्या हिजाब को यूनिफॉर्म के साथ पहनने का कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता?
अब बात उस देश की, जहां यह विवाद खड़ा हुआ है
अजरबैजान (Azerbaijan)) की लगभग 96 प्रतिशत आबादी खुद को मुस्लिम मानती है। अजरबैजान (Azerbaijan) का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित करता है और धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है। सरकार का तर्क है कि स्कूलों में एक समान ड्रेस कोड होना चाहिए और शिक्षा का माहौल धर्मनिरपेक्ष रहना चाहिए। लेकिन धर्मनिरपेक्षता का मतलब क्या धार्मिक पहचान को पूरी तरह निजी जीवन तक सीमित कर देना है? क्या किसी छात्रा का सिर ढककर स्कूल आना अपने आप में शिक्षा के माहौल के खिलाफ है? और अगर किसी लड़की ने अपनी मर्जी से हिजाब पहना है, तो उसकी इच्छा को समझे बिना उस पर रोक लगाना कितना उचित है? यहां यह भी स्पष्ट रहे कि पहले के नियमों में भी यूनिफॉर्म का प्रावधान था। नया बदलाव धर्मनिरपेक्षता की शर्त को स्पष्ट रूप से नियम में जोड़ने से जुड़ा है।
इस फैसले का विरोध अब स्कूलों तक पहुंच चुका है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बाकू और मसाली जिले के कुछ स्कूलों में छात्राओं ने हिजाब पहनने वाली सहपाठियों के समर्थन में कक्षाओं का बहिष्कार किया। बाकू के एक स्कूल के बाहर प्रदर्शनकारियों ने संदेश दिया कि हिजाब शिक्षा में बाधा नहीं है। 12 अक्टूबर को अजरबैजान (Azerbaijan) के आंतरिक मंत्रालय से जुड़ी रिपोर्टों में नियम लागू कराने के दौरान हुए विवादों के सिलसिले में 37 लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी भी सामने आई। अधिकारियों का आरोप है कि कुछ लोगों ने स्कूल कर्मचारियों से टकराव किया और शैक्षणिक संस्थानों के काम में बाधा डालने की कोशिश की। वहीं, विरोध करने वालों के लिए यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा तक पहुंच का है। जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने भी इन नियमों के विरोध में भूख हड़ताल शुरू करने की बात कही है। यानी यह विवाद अब सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अधिकारों, सरकारी नियमों और विरोध की आवाजों तक पहुंच गया है।
क्या एकरूपता बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत पसंद को पूरी तरह खत्म करना जरूरी है? स्कूलों में अनुशासन और समान नियम होने चाहिए, लेकिन उन नियमों को बनाते समय छात्राओं की शिक्षा, गरिमा और स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना होगा। किसी लड़की को हिजाब पहनने के लिए मजबूर करना गलत है, तो अपनी इच्छा से हिजाब पहनने वाली लड़की को शिक्षा से दूर करना भी गंभीर सवाल खड़े करता है। असली धर्मनिरपेक्षता यह है कि राज्य किसी पर धर्म थोपे भी नहीं और किसी की स्वेच्छा से चुनी गई धार्मिक पहचान को बेवजह कुचले भी नहीं? क्योंकि स्कूल का दरवाजा ज्ञान हासिल करने के लिए खुलना चाहिए, किसी छात्रा की पोशाक के कारण बंद नहीं होना चाहिए।


