Rahul Gandhi: बिहार में इस साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं जिसको लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटी हैं। एक तरफ सीएम नीतीश कुमार प्रगति यात्रा के जरिए माहौल बनाने में जुट गए हैं। वहीं, दूसरी ओर हैं तो दूसरी तरफ तेजस्वी यादव भी कार्यकर्ता दर्शन सह संवाद कार्यक्रम के माध्यम से प्रदेश के अलग-अलग जिलों में जाकर पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं। इसी बीच कांग्रेस भी चुनावी रणनीति के तहत कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। इसी वजह से राहुल गांधी को 18 दिन में दूसरी बार बिहार दौरे पर हैं। दरअसल, बिहार की राजनीति में राहुल गांधी का सक्रिय होना कई संदेश देता है। 5 फरवरी को उनकी यात्रा दलित नेता जगलाल चौधरी को सम्मान देने से जुड़ी है। कांग्रेस बिहार में अपनी पुश्तैनी जमीन, विशेषकर दलित और मुस्लिम वोट बैंक पर ध्यान केंद्रित करते हुए आगामी विधानसभा चुनाव में फूल स्पीड से लड़ने की तैयारी में है।
कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस बिहार में अपना खोया हुआ वजूद वापस लाना चाहती है। इसलिए राहुल गांधी भी बिहार को लेकर एक्टिव दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी के दौरे को लेकर सियासत भी तेज हो गई है। राहुल गांधी आज पटना के एसके ममोरियल हॉल में आयोजित जगलाल चौधरी के 130वीं जयंती समारोह में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक जानकारों का कहना है कि स्वर्गीय जगलाल चौधरी की जयंती के बहाने कांग्रेस दलितों को साधने की कोशिश में जुटी है।
गौरतलब है कि कांग्रेस पिछड़े और दलित वोटरों को लुभाने पर जोर दे रही है। पिछले दिनों पटना में संविधान सुरक्षा सम्मेलन में भी राज्यभर के दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछले वर्ग के लोग शामिल हुए थे। ये वही सम्माननीय जगलाल चौधरी हैं जिन्होंने सबसे पहले बिहार के छह जिलों में शराबबंदी लागू की थी। साल 1937 में बनी सरकार में ये मंत्री भी रहे। ये उस दौर के दलित नेता थे जिनका विशेष प्रभाव था। राहुल गांधी अगर दूसरी बार बिहार आ रहे हैं तो यह दलित नेता जगलाल चौधरी को सम्मान देने के लिए आ रहे हैं। ऐसे में जयंती समारोह को भी कांग्रेस की चुनावी रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है।
इससे पहले राहुल गांधी 18 जनवरी को बापू सभागार में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस दौरान राहुल गांधी बीपीएससी अभ्यर्थियों से मिले और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास पर जाकर राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों से भी मिली। राहुल के इन सब कदम से इतना तो तय है कि उनके तेवर कुछ अलग तो जरूर हैं। और यह तेवर यूं ही नहीं हरियाणा विधानसभा चुनाव और होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव के अनुभव का परिणाम साफ-साफ दिख रहा है। दिल्ली के चुनाव में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का अरविंद केजरीवाल की पार्टी से हाथ मिला लेना भी तो एक अनुभव ही है।
बिहार चुनाव को लेकर कांग्रेस की तरफ से लगातार 70 सीटों पर लड़ने वाली बात को चलते रहने देना। और फिर राजद सुप्रीमो लालू यादव से मिलना, उनके परिवार से बातचीत का वीडियो जारी करना आखिर किस राजनीति के घालमेल का संकेत कर रहे है? वहीं, जानकारों का मानना है कि बिहार में इस बार महागठबंधन की राजनीति में कांग्रेस का अपर हैंड रहेगा। ऐसे में अगर कांग्रेस अब राहुल गांधी के इस बदलते तेवर के साथ राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के निर्णय के तहत छतरी नहीं खोलेगी। साथ ही ये संभावना व्यक्त की जा रही है कि बिहार के दो चेहरे इन दिनों राहुल गांधी के नए क्षत्रप बन सकते हैं। और ये नाम हैं पप्पू यादव और कन्हैया कुमार। अब इनका इस्तेमाल कांग्रेस किस तरह से और किस पद के साथ करेगी यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। पर इस चेहरे से बिहार की राजनीति को नई ताकत देने जा रहे है। पप्पू यादव को लाकर कांग्रेस सीमांचल के साथ साथ यादव मत को कांग्रेस के साथ जोड़ सकती है वहीं कन्हैया कुमार के जरिए भूमिहार जाति और उसके वाम कनेक्शन का लाभ भी उठा सकती है। बताते चलें कि बिहार चुनाव में कांग्रेस को अपने पुराने वोटर दलित और मुस्लिममतों को एकजुट करना है। इसका मतलब है कि पार्टी को लगभग 30 से 32 प्रतिशत के आधार वोट की राजनीति पर फोकस करना है। दलित नेता जगलाल चौधरी की जन्म जयंती पर आना दलित मतों को साधने की कवायद की शुरुआत भर है।


