Delhi Elections: दिल्ली चुनाव में भाजपा या कांग्रेस ने अपनी सीएम फेस साफ नहीं किया है। जिसे लेकर केजरीवाल ब्रिगेड ने एक बारात निकाली। बारात में बैंड-बाजा, घोड़ा-गाड़ी सब थे, बाराती के तौर पर पीएम मोदी, अमित शाह, मनोज तिवारी जैसे तमाम चेहरों का मुखौटा लगाए लोग नाच रहे थे। लेकिन घोड़े के उपर कोई सवार नहीं था। लोगों के हाथ में बैनर थे। आखिर दूल्हा कौन! ये आम आदमी पार्टी का प्रचार करने और विपक्ष को निशाने पर लेने का एक चुनावी तरीका था। और तरीका भी कितना फनी कितना यादगार और कितना सटीक? माने किएटिविटि की भी हद्द होती है।
दिल्ली चुनाव में अपनी तमाम दावेदारियों के अलावा केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के पास बोनस फैक्टर ये है कि दिल्ली में भाजपा या कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्रियों का फेस साफ नहीं किया है। आए दिन रैलियों में केजरीवाल अपने बाकी दोनों विपक्षी दलों से ये सवाल पूछते रहते हैं। कि दूल्हा कौन…दिल्ली में केजरीवाल ने वही पैठ जमा ली है। जो पैठ बिहार में नीतीश बाबू, बंगाल में ममता या केन्द्र में मोदी की है। केजरीवाल को दिल्ली से हटाना विपक्षियों को लिए दाल-भात के कौर जैसे क़तई नहीं है। खासतौर पर तब जब TINA फैक्टर काम कर रहा हो। टी आई एन ए टीना यानी There is no alternative. दिल्ली की जनता अगर बदलाव का सोचती भी है तो ये सवाल जनता के मन में ज़रूर कौंध उठता होगा कि केजरीवाल नहीं तो कौन…! साल 2013 के बाद से ही दिल्ली का तकरीबन यही हाल है, अरविंद केजरीवाल के मुकाबले का कोई नेता अब तक न तो बीजेपी को मिल सका है, न ही कांग्रेस को। हैं भी अगर नेता तो शोर मचाने वाले, भड़काऊ और विवादित बयान देने वाले दोनों। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस में कोई एक चेहरा नहीं नजर आता जो केजरीवाल के मुकाबले खड़े होकर चैलेंज करने की स्थिति में लगता हो।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि कोई नेता है ही नहीं। निश्चित तौर पर कुछ तो होंगे ही, लेकिन किसी भी नेता को हाल फिलहाल उस तरीके से प्रोजेक्ट नहीं किया गया है – ये काम न तो बीजेपी करती है, न ही कांग्रेस नेतृत्व कर रहा है। दिल्ली में विपक्षी दल दूसरा विकल्प उतारने में नाकाम दिखाई देती है। जिस वजह से दिल्ली की वो जनता जो बदलाव करना भी चाहती है वो ये सोच कर रह जाती है कि अरविंद केजरीवाल नहीं तो आखिर दूसरा कौन! चूंकि दिल्ली में केजरीवाल का दबदबा है ऐसे में विपक्षी के लिए ये आसान नहीं होता कि सीएम फेस उतार सकें। ऐसे में दिल्ली में केजरीवाल के लिए TINA फैक्टर काम करता हुआ दिखाई दे सकता है। बावजूद अबकी दिल्ली में जो सत्ता विरोधी लहर सामने दिखाई दे रही है। इसमें आम आदमी पार्टी का रास्ता भी आसान नहीं है। यहां तक की नई दिल्ली सीट जो मुख्यमंत्रियों की सीट कही जाती है, वहां भी मुकाबला कड़ा है। भाजपा से पूर्व सांसद और पूर्व मुख्यमंत्रि साहेब सिंह वर्मा के बेट प्रवेश वर्मा खड़े हैं वहीं भाजपा से संदीप दीक्षित खड़े हैं जोकि दिल्ली की शिल्पकार कही जाने वाली शिला दीक्षित के बेटे हैं। मगर क्या दिल्ली में कांटे की टक्कर के बीच भी TINA फैक्टर रंग लाता हुआ दिखाई पड़ेगा? साल 2015 की बात करें तो साल 2015 में भाजपा ने चर्चित आईपीएस किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल के सामने उतारा था। लेकिन वो हार गईं थीं। और भाजपा केवल 3 सीटों पर सिमट गई थी। कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था।
उससे पीछे साल 2013 में कांग्रेस को 8 सीटें मिली थीं। और कांग्रेस के साथ मिलकर ही अरविंद केजरीवाल पहली बार सरकार बनाने में सफल हुए थे। तब भाजपा को जरूर डॉ हर्षवर्धन के नेतृत्व में लड़ते हुए सबसे अच्छी खासी सीट मिली, लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनाव में भाजपा सीटों के मामले में दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी है। साल 2020 के चुनाव को भाजपा की तरफ से मनोज तिवारी लीड कर रहे थे। लेकिन चुनाव में कभी लगा नहीं कि वो कोई चेहरा भी हैं, जबकि अमित शाह के खास तौर पर जिक्र करने के कारण प्रवेश वर्मा थोड़े खास लगते थे। तब वो सांसद हुआ करते थे, लेकिन इस बार विधानसभा के रण में केजरीवाल के खिलाफ नई दिल्ली सीट से मोर्चा संभाल रहे हैं।
साल 2020 का दिल्ली चुनाव भी मोदी और शाह के चेहरे पर लड़ा गया था। हार के बाद संघ की तरफ से कहा गया कि बीजेपी दिल्ली में स्थानीय नेतृत्व तैयार करे। मोदी या शाह के भरोसे नहीं रहे। साल 2025 आ गया है लेकिन दिल्ली में इस मामले में कोई बदलाव नज़र नहीं आया है।
कांग्रेस की भी कमोबेश यही हाल है। शीला दीक्षित के किए हुए कामों पर कांग्रेस आश्रित नजर आती है। कोई नया चेहरा तैयार नहीं हो पाया है। बहरहाल इस सबके बीच दिल्ली में सत्ता विरोधी लहर काम तो कर रही है जिससे दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस को फायदा तो साफ तौर पर मिलता नजर आ रहा है। केजरीवाल खुद भी कुछ सीटें हाथ के जाने की बात को आनसिक रूप से कबूल रहे हैं। आम आदमी पार्टी कहीं भी 60 पार का दावा नहीं कर रही है। लेकिन दिल्ली में अभी भी एक सवाल जनता के मन में जीवीति है कि दिल्ली में केजरीवाल नहीं तो कौन! राजनीति के जानकार बताते हैं कि यही सवाल 2004 के लोकसभा चुनाव में भी था कि अटल नहीं तो कौन…जनता ने किसी को चुना नहीं लेकिन भाजपा को नकार जरूर दिया था। बहरहाल 5 फरवरी को EVM की पेटी में जनादेश कैद हो जाएगा और 8 फरवरी को तस्वीरें साफ होंगे कि दिल्ली का दिल किस पार्टी और कौन-कौन से उम्मीदवार से मिल रहा है।


