BJP News: बीजेपी में इन दिनों संगठन के चुनाव चल रहे हैं। पार्टी को खुद पर इतना विश्वास है कि वह देश की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है। लेकिन क्या पार्टी का यह दावा सही है, या फिर पार्टी के अंदर ही कुछ ऐसी चीजें हो रही हैं, जो इसके भविष्य के लिए खतरे की घंटी बन सकती हैं? एक समय था जब बीजेपी को ‘द पार्टी विद ए डिफरेंस’ कहा जाता था। इसमें कोई शक नहीं कि बीजेपी का एक मजबूत कैडर नेटवर्क था और पार्टी के आंतरिक अनुशासन को लेकर भी इसकी एक अलग पहचान बन चुकी थी। लेकिन यहां सवाल ये उठ रहा है कि क्या अब वही पार्टी, जो अपने आंतरिक लोकतंत्र के लिए मशहूर थी, केंद्रीयकरण की ओर बढ़ रही है? आइये इस पूरे मुद्दे को आपको विस्तार से समझाते हैं।
बीजेपी में इन दिनों खींचतान देखने को मिल रही हैं, जहां नए पदाधिकारियों का चुनाव किया जा रहा है। पार्टी ने अपने सदस्य संख्या को 10 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। यह एक अच्छा संकेत है कि पार्टी अपनी जड़ें और भी मजबूत करना चाहती है। लेकिन पार्टी में कई नेताओं का कहना है कि इस बात में अब कोई शक नहीं है कि पार्टी की सारी शक्ति दिल्ली यानी शीर्ष नेतृत्व के माध्यम से नियंत्रित होती है।अगर आप गहराई से देखें, तो यह बात सही भी लगती है।क्योंकि पार्टी में फैसले अब केंद्रीय स्तर पर लिए जा रहे हैं, और राज्य स्तर के नेताओं को अपनी भूमिका निभाने के लिए बहुत कम जगह मिल रही है। यह कुछ ऐसा है जैसे सत्ता की चाबी अब केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में है। हम ऐसा इसीलिए कह रहे है क्योंकि इससे पहले पिछले साल हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा ही कुछ देखने को मिला था। जिन नेताओं का चयन इन राज्यों में मुख्यमंत्री के लिए किया गया, उसके बारे में जानकर लोगों को भी हैरानी हुई थी। वो इसी लिए क्योंकि अब मुख्यमंत्री का चयन शीर्ष नेतृत्व के द्वारा किया जाता है और इस बारे में फैसला विधायक दल को बता दिया जाता है।पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह तरीका कुछ ज्यादा ही केंद्रीकरण की ओर इशारा करता है।
पार्टी के नेता ये बात इसीलिए कह रहे है क्योंकि एक समय था जब इन राज्यों में मुख्यमंत्री का चयन लोकसभा या विधानसभा चुनावों के बाद विधायकों के बीच होता था, लेकिन अब केंद्रीय नेतृत्व का दबदबा बढ़ता जा रहा है। बता दें कि बीजेपी की संसदीय दल की बैठकें अब बहुत कम हो गई है। यहां तक कि 18वीं लोकसभा का गठन हुए अब 6 महीने से ज्यादा का वक्त हो गया है। और एक बार भी बीजेपी संसदीय दल की बैठक नहीं हुई है। बीजेपी सांसदों की ऐसी बैठक जून में हुई थी और इसमें एनडीए के सहयोगी दल भी शामिल हुए थे। ऐसे में सोचने वाली बात ये है कि अगर एक पार्टी में संसदीय दल के नेता और सदस्यों के बीच संवाद नहीं होगा। तो वहां की राजनीति किस दिशा में जाएगी। खासकर जब पार्टी का लक्ष्य लोकसभा चुनाव में बहुमत से सत्ता में रहना है। यहां एक और सबसे हैरानी वाली बात ये है। इसी तरह, पार्टी के केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकें भी बहुत कम हो गई हैं। बीते कुछ समय में जिन चुनावों के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की गई। उनके लिए सीईसी की बैठक तक नहीं हुई। बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि उम्मीदवारों के नामों की एक फाइल को सीईसी के सदस्यों को दिया गया और इसके बाद उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया गया। बता दें कि झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के लिए सीईसी की सिर्फ एक बार बैठक हुई थी। जबकि आमतौर पर ऐसा होता है कि हर लिस्ट जारी होने से पहले इसकी एक बैठक होती है। इसका मतलब यह हुआ कि केंद्रीय स्तर पर ही सारी बैठकों और निर्णयों को लिया जा रहा है और नीचे के स्तर के नेताओं को इससे काफी हद तक बाहर रखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अभी भी बीजेपी का ट्रंप कार्ड है। इसलिए पार्टी कार्यकर्ता इसे लेकर कोई शिकायत नहीं कर सकते।।।हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि लंबे वक्त तक ताकत का ‘केंद्रीकरण’ होने से पार्टी को नुकसान हो रहा है। इसके अलावा बीजेपी को हर स्तर पर उसके प्रभावशाली नेताओं की ताकत का फायदा भी नहीं मिल पा रहा है। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि नई पीढ़ी के मुख्यमंत्रियों में से अधिकतर सीधे केंद्र से ‘निर्देश’ लेते हैं। वे दिल्ली से मिलने वाले निर्देशों का पालन करते हैं। हालांकि इसमें से कुछ ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो स्वतंत्र रूप से अपनी पहचान बन चुके हैं। जैसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, हिमंता बिस्वा सरमा असम में और देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र में। आपको बता दें कि इन दिनों बीजेपी संगठन के चुनाव चल रहे हैं।।।इसी बीच बीजेपी का गोवा में कुछ नेताओं ने यह कहकर विरोध किया कि मंडल अध्यक्षों के पद पर चुने गए नेता मंत्रियों और विधायकों के करीबी हैं। और इसी तरह से केरल में भी मंडल समितियों के अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी नेताओं के बीच झगड़े की खबरें सामने आई है।
अगर आप गौर करेंगे तो बीजेपी के पास जमीनी नेटवर्क और कैडर मूवमेंट है, जो कांग्रेस या अन्य वामपंथी दलों के पास नहीं है।।।लेकिन अगर पार्टी का केंद्रीयकरण बढ़ता गया और राज्यों के नेता अपनी पहचान खो बैठेंगे।।।जिससे बीजेपी भी कांग्रेस की तरह कमजोर हो सकती है, क्योंकि “कांग्रेस तब कमजोर होने लगी जब उसका हाईकमान बहुत ताकतवर हो गया और इससे हुआ यह कि राज्यों में नेतृत्व पंगु हो गया। 1970 और 1980 के दशक में कांग्रेस जीत के लिए पूरी तरह अपने केंद्रीय नेतृत्व इंदिरा और राजीव गांधी पर निर्भर थी।।।इंदिरा और राजीव गांधी के जाने के बाद कांग्रेस का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। ऐसे में बीजेपी लेकर भी ऐसे ही कयास लगाने शुरू हो गये है।।।लेकिन बीजेपी के भीतर क्या हो रहा है, यह तो समय ही बताएगा।


