Delhi Elections: दिल्ली में विधानसभा चुनाव के तारीखों की घोषणा हो चुकी है। दिल्ली में 5 फरवरी को मतदान होगा और 8 फरवरी को चुनाव के परिणाम घोषित किए जाएंगे। ऐसे में दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने आ चुकी है। तीनों दलों द्वारा अपनी जीत का दावा किया जा रहा है। इस बार का चुनाव दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि दिल्ली में हर तबके का वोट निर्णायक भूमिका में है।
वहीं, बीते 10 सालों से दिल्ली कि सत्ता पर काबिज रही आम आदमी पार्टी को पहली बार सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है। जबकि अरसे से सत्ता से बाहर रहने वाली कांग्रेस इस बार चुनावी रण में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। बीते एक साल के अंदर ही कई बड़े दलित और मुस्लिम नेताओं ने आम आदमी पार्टी का साथ छोड़ दिया है। हालिया समीकरण को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि दिल्ली के लगभग डेढ़ दर्जन सीटों पर कांग्रेस ‘आप’ का खेल बिगाड़ सकती है। इस बार के विधानसभा चुनाव में दलित और मुस्लिम यानी MY बहुल सीटों पर कांग्रेस ‘आप’ को कड़ी टक्कर दे रही है।
मुसलमानों में AAP से नाराजगी
राजनीतिक जानकारों की मानें तो दिल्ली के मुसलमानों में इस बार अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) से खासी नाराजगी है। इसके लिए एक नहीं बल्कि कई वजह हैं-उनका मानना है कि साल 2020 में हुए दिल्ली के दंगों के दौरान केजरीवाल ने उनकी अनदेखी की है। इतना ही नहीं दिल्ली के जाहंगीरपुरी और पूर्वी दिल्ली इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा के बाद न तो आपने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और न ही पीड़ित एवं असुरक्षित समुदायों के पक्ष में सार्वजनिक रूप से कुछ बोला।बिलकिस बानो मामला जिसने जाति धर्म से परे जाकर देश की संवेदनाओं को झकझोर दिया था। लेकिन तब भी मनीष सिसोदिया ने उस शर्मनाक घटनाक्रम की निंदा करने या उसपर किसी तरह की टिप्पणी करने से स्पष्ट शब्दों में इंकार कर दिया था।
वहीं, जब CAA और NRC प्रोटेस्ट के दौरान शाहीन बाग को लेकर ‘आप’ ने खाली कराने को लेकर जो बयान दिया था, उससे मुस्लिम समुदायों की आवाज और कमजोर हुई। इन सभी मुद्दों को लेकर मुस्लिम वोटर्स में AAP के दृष्टिकोण को लेकर सवाल खड़े हुए। जबकि चुनाव से पहले कई बड़े मुस्लिम नेताओं का केजरीवाल का साथ छोड़ने ने आम आदमी पार्टी को कहीं ना कहीं और कमजोर किया है।
AAP पर दलितों एवं अल्पसंख्यकों से भेदभाव का आरोप
वहीं आम आदमी पार्टी के बड़े दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम (Rajendra Pal Gautam) ने पार्टी छोड़ने के बाद आरोप लगाया था कि आम आदमी पार्टी में दलितों एवं अल्पसंख्यकों से भेदभाव किया जाता है। इनके अलावा दिल्ली मंत्रिपरिषद में उनकी जगह लेने वाले राज कुमार आनंद ने बीजपी का दामन थाम लिया था। मौजूदा समय में आम आदमी पार्टी में सिर्फ दो प्रमुख दलित नेता बचे हैं। इनमें से एक मंगोलपुरी विधायक राखी बिड़ला है। राखी दिल्ली विधानसभा की उपाध्यक्ष भी हैं। दूसरे नेता कोंडली विधायक कुलदीप कुमार है। कुलदीप लोकसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से मैदान में उतरे थे लेकिन असफल रहे थे।
AAP पर गंभीर सवाल
ऐसे में प्रमुख दलित नेताओं का पार्टी से बाहर होना इस बात का संकेत है कि समुदाय के मामले में आम आदमी पार्टी के सामने समस्या खड़ी हो सकती है। गौतम ने पार्टी छोड़ने से पहले पार्टी नेतृत्व पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब केजरीवाल के सामने इन आरोपों को झूठा साबित करने की चुनौती है। बता दें कि दिल्ली में 17 फीसदी वोटर दलित समुदाय का है, जिनके लिए राज्य की कुल 70 विधानसभा सीटों में से 12 सीटें सुरक्षित हैं। इसके अलावा दिल्ली कई सीटों पर दलित वोट प्रतिशत काफी ज्यादा है।


