Delhi Elections: राजनीति भी बिल्कुल पासे की तरह होती है, एक बार जो पलट जाए तो किस्मत बन भी सकती है बिगड़ भी सकती है। ऐसा ही हुआ है AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल के साथ अभी कुछ समय पहले तक ये कयास लगाए जा रहे थे कि अबकी बार भी दिल्ली में केजरीवाल होंगे। लेकिन अब सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या अबकी बार भी केजरीवाल होंगे? ये हम इस लिए कह रहे हैं कि, क्योकि दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी को एक बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के आठ विधायकों ने मतदान से महज़ पांच दिन पहले इस्तीफा दे दिया। ये सभी विधायक पार्टी से असंतुष्ट थे और उन्होंने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व और पार्टी की कार्यशैली पर कई सवाल उठाए हैं। इस्तीफा देने वाले विधायकों में महरौली के विधायक नरेश यादव, त्रिलोकपुरी के रोहित कुमार, जनकपुरी के राजेश ऋषि, कस्तूरबा नगर के मदन लाल, जैसे कई और नेता शामिल हैं।अब इन विधायकों ने ये आरोप लगाया कि पार्टी ने उनकी उम्मीदों से समझौता किया है और उनके समाज के लिए कोई ठोस काम नहीं किया।।।सवाल अब यहां ये है की क्या इन विधायकों के इस्तीफे के बाद केजरीवाल जीत पाएंगे।
इन सात विधायकों का इस्तीफा चुनाव से ठीक पहले, जब नामांकन की अंतिम तिथि बीत चुकी थी और पार्टी ने अपनी उम्मीदवारी का ऐलान कर दिया था, ये सवाल उठाता है कि उन्होंने यही समय क्यों चुना। विशेषज्ञों का मानना है कि ये एक रणनीतिक कदम हो सकता है, जिसका मकसद आम आदमी पार्टी पर दबाव डालना है। ऐसी भी हो सकता है कि विपक्षी दलों ने इन विधायकों को इस समय इस्तीफा देने के लिए उक्साया हो, इसका मतलब ये हो सकता है कि इन विधायकों को ये लगता हो कि अगर आम आदमी पार्टी चुनाव हारती है, तो दूसरी पार्टी से उन्हें लाभ मिल सकता है।।।।ये इस्तीफा पार्टी के भीतर की असहमति और नेतृत्व के प्रति बढ़ते असंतोष को भी उजागर करता है। ये विधायक पार्टी के भ्रष्टाचार, कार्यशैली और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर लगातार असंतुष्ट थे। त्रिलोकपुरी के विधायक रोहित कुमार ने तो ये आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी ने दलित और वाल्मीकी समाज के लिए कुछ नहीं किया, जबकि पार्टी ने इस समाज से कई चुनावों में समर्थन लिया था।
इस इस्तीफे में एक आम बात ये है कि सभी विधायकों ने अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। कई विधायकों का कहना है कि, केजरीवाल ने सार्वजनिक मंचों पर कई बार वादा किया था कि उनकी सरकार दलित और वाल्मीकी समाज के कल्याण के लिए काम करेगी, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं हुआ। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि पार्टी ने उनके समाज को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया और उन्हें सत्ता में लाने के बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाए।।।दिल्ली में आम आदमी पार्टी के लिए इन सात विधायकों का इस्तीफा एक बड़ा मुद्दा बन गया है, खासकर ऐसे समय में जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। हालांकि, पार्टी ने पहले ही 17 मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया था और कई परिवार के सदस्यों को उम्मीदवार बनाया था, जिससे टिकट वितरण को लेकर पार्टी में असंतोष था। इन इस्तीफों के बाद, पार्टी के सामने ये सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ेगा?
आम आदमी पार्टी 2020 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज कर चुकी है और पार्टी को इस बार भी अपनी जीत की उम्मीद है, लेकिन इन इस्तीफों से चुनावी माहौल में एक तरह की अस्थिरता आ गई है। पार्टी के लिए ये एक मुश्किल घड़ी है , खासकर ऐसे में जब विधायकों की टिकट कटने के बाद उनका समर्थन और नाराजगी पार्टी के खिलाफ जाती है। इसके अलावा, पार्टी ने जो टिकट कटवाए, उनमें से नरेश यादव का मामला भी चर्चा में है। नरेश यादव को पहले महरौली से उम्मीदवार बनाया गया था, लेकिन बाद में उनका टिकट काटकर महेंद्र चौधरी को दे दिया गया। नरेश यादव पर 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान कुरान की बेअदबी का आरोप था और इस मामले में कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था। इस वजह से भी उनका टिकट काटा गया, लेकिन इसके बावजूद उनका इस्तीफा पार्टी के लिए एक राजनीतिक मुद्दा बन गया।
अब सवाल ये है कि इन 7 विधायकों के इस्तीफे से दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणामों पर क्या असर पड़ेगा। सबसे पहले तो ये समझना जरूरी है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की राजनीति काफी मजबूत है, खासकर शहरी क्षेत्रों में, जहां पार्टी ने अपने विकास कार्यों और शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के ज़रिए से जनता में अपनी पहचान बनाई है। लेकिन इन इस्तीफों से पार्टी की छवि पर सवाल उठ सकते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां ये विधायक चुनावी दबाव में थे। आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए और कई मुद्दों पर फोकस करना होगा। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने हमेशा दिल्ली की जनता के बीच विकास और पारदर्शिता को अपनी ताकत बताया है, और ये पार्टी के लिए ज़रूरी होगा कि वो अपनी छवि को किसी भी असंतोष से बचाए रखे।
हालांकि, बीजेपी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे और इन इस्तीफों को अपनी चुनावी रणनीति में शामिल करेंगे। यदि इन इस्तीफों से पार्टी के समर्थन में कमी आती है, तो ये आम आदमी पार्टी के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है, लेकिन यदि पार्टी अपनी रणनीति को सही तरीके से लागू करती है और लोगों के बीच अपने काम को प्रमोट करती है, तो इसका असर सीमित हो सकता है।।।इन सात विधायकों का इस्तीफा आम आदमी पार्टी के लिए चुनावी समिकरण को बदलने की चुनौती पेश करता है। हालांकि पार्टी की जड़ें दिल्ली में मजबूत हैं, लेकिन इन इस्तीफों से उसका नेतृत्व और चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है। ये देखना दिलचस्प होगा कि केजरीवाल और उनकी पार्टी इस मुश्किल का सामना कैसे करते हैं और आगामी चुनाव में वो जनता के बीच अपनी स्थिति को बनाए रखने में सफल होते हैं या नहीं।


