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    इस्लाम में पाकीज़गी की मज़हबी अहमियत: Haji Syed Salman Chishty

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    दरगाह अजमेर शरीफ़ के गद्दी नशीन और चिश्ती फाउंडेशन के अध्यक्ष हाजी सैयद सलमान चिश्ती (Haji Syed Salman Chishty) का कहना है कि इस्लाम सफ़ाई और हिफ़ज़ान-ए-सेहत (स्वच्छता) पर बहुत ज़ोर देता है, यह उन्हें ऐसी मुक़द्दस (पवित्र) ज़िम्मेदारी के रूप में देखता है जो रूहानी तरक्क़ी (आध्यात्मिक विकास) और सामुदायिक कल्याण के साथ आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।

    Haji Syed Salman Chishty का कहना है कि कुरान, हदीस और सूफी बुज़ुर्गों की तालीमात (शिक्षाएँ) इस बात पर रोशनी डालती हैं कि हमारे रहन-सहन और माहौल में साफ़-सफाई को बनाए रखना और ज़िंदगी के बेहतर मयार के लिए कोशिशें करना उस ख़ालिक़ (ख़ुदा/रचयिता) की इबादत है और उसके लिये हमारी शुक्र गुज़ारी का मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) है। स्वच्छता, अपने सभी रूपों में, सिर्फ़ एक ज़ाती (व्यक्तिगत) ख़ूबी नहीं है, बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है, जो जिस्मानी सेहत (शारीरिक स्वास्थ्य), रूहानी पाकीज़गी (आध्यात्मिक शुद्धता) और सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देती है।

    कुरान स्पष्ट रूप से शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों तरह की स्वच्छता के महत्त्व पर ज़ोर देता है। अल्लाह कहता है: “बेशक अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो हमेशा तौबा करते रहते हैं और पाकीज़गी इख्तियार (अपनाते) करते हैं।” (कुरान 2:222)।

    यह आयत इस बात पर ज़ोर देती है कि जिस्म (शरीर), दिल (हृदय) और आस-पास की पाकीज़गी (शुद्धि) एक इल्हामी मुहब्बत (ईश्वरीय प्रेम) का एक अमल (कार्य) है।

    मुसलमानों को अल्लाह की तरफ़ अपनी इबादत (भक्ति) के हिस्से के रूप में अपने घरों, पड़ोस और शहरों को साफ रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

    पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब (peace be upon him) ने भी इस अमल (कर्तव्य) पर प्रकाश डाला है, उन्होंने कहा:
    “सफाई ईमान का आधा हिस्सा है।” (सहीह मुस्लिम)।

    हाजी सैयद सलमान चिश्ती (Haji Syed Salman Chishty) कहते हैं- “स्वच्छ और साफ रहना न केवल एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि ख़ुद को और दूसरों को नुकसान से बचाने का एक ज़रिया (साधन) भी है, जो “न किसी के नुकसान की वजह बनो और न बदले में किसी को नुकसान पहुँचाओ” के पैग़म्बर साहब के मार्गदर्शन को पूरा करता है।

    इस्लाम ऐसी जगहों/बस्तियों की वकालत करता है जो भीड़-भाड़ वाली या स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक न हों। विशालता और हरियाली अल्लाह की तरफ़ से उपहार हैं, जो शारीरिक आराम और आध्यात्मिक शांति दोनों को बढ़ावा देते हैं। कुरान हमें याद दिलाता है: “और हमने तुम्हारे लिए उसमें ज़िंदगी गुज़ारने के अस्बाब (साधन) बनाए हैं और (उनके लिये भी) जिनको तुम रोज़ी देने वाले (providers) नहीं हो हो।” (कुरान 15:20)।

    यह आयत मुसलमानों को अल्लाह की तरफ़ से बनाए गए तवाज़ुन (संतुलन) और ख़ूबसूरती (सुंदरता) पर ग़ौर (विचार) करने की दावत (आमंत्रित) देती है, बिरादरियों (समुदायों) से इन उसूलों (सिद्धांतों) के मुताबिक़ बस्तियों को डिज़ाइन करने और बनाए रखने का आग्रह करती है। आलूदगी (प्रदूषण) और कचरे से मुक्त स्वच्छ और हरे-भरे पड़ोस बनाना, अल्लाह के आशीर्वाद के लिए हमारे शुक्र का ही बढ़ा हुआ रूप है।

    सूफी तालीमात (शिक्षाएँ) सृष्टि के सभी परस्पर संबंधों (interconnectedness) पर ज़ोर देकर इस अख़लाक़ियत (लोकाचार) को बढ़ाती हैं। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (r.a.) ने सिखाया, “ख़ुदा का सच्चा सेवक वह है जो ख़ुदा की रचना का पोषण और उसकी हिफाज़त (सुरक्षा) करता है।” इस पोषण में वे स्थान शामिल हैं जहाँ हम रहते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे सभी के लिए स्वास्थ्य, शांति और सम्मान को बढ़ावा दें।

    इस्लाम की तालीमात इसके मानने वालों को स्लम (मलिन बस्तियों) और भीड़भाड़ वाले इलाक़ों की बहाली (पुनर्वास) के साथ ही ज़रूरतमंदों की तरक्क़ी (उत्थान) के लिए प्रेरित करती हैं। पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब (peace be upon him) ने कहा: “वह मोमिन (believer) नहीं है जिसका पेट भरा हो जबकि उसका पड़ोसी भूखा हो।” (सुनन इब्न माजा)।

    यह हदीस हमें यह तय (सुनिश्चित) करने की इजतमायी (सामूहिक) ज़िम्मेदारी की याद दिलाती है कि समाज में हर कोई सम्मान के साथ रहे। झुग्गी-झोपड़ियों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में अक्सर बुनियादी साफ़-सफ़ाई, स्वच्छ पानी और रहने के माक़ूल हालात (उचित परिस्थितियों) की कमी होती है, जिससे वहाँ रहने वालों को बीमारी और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इन चुनौतियों का समाधान करना ईमान (आस्था), हमदर्दी और इंसाफ का कार्य है।

    सलमान चिश्ती कहते हैं हैं कि पुनर्वास परियोजनाओं में साफ़ पानी, अपशिष्ट प्रबंधन, हरित स्थान और पर्याप्त आवास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सूफी परंपराएं सिखाती हैं कि बाहरी वातावरण का परिवर्तन आत्मा की शुद्धि को दर्शाता है। जैसा कि रूमी ने कहा, “कल मैं चतुर था, इसलिए मैं दुनिया को बदलना चाहता था। आज मैं बुद्धिमान हूँ, इसलिए मैं खुद को बदल रहा हूँ।” बाहरी वातावरण को संबोधित करके, हम आंतरिक और सामुदायिक विकास को बढ़ावा देते हैं।

    स्वच्छता और बेहतर जीवन स्तर में प्रगति की बाधाओं में से एक बदलाव या परिवर्तन का प्रतिरोध है। इस्लाम के मानने वालों को सकारात्मक परिवर्तन को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, क्योंकि यह “अल्लाह की नज़र में लगातार बेहतरी” के उसूल के साथ मेला खाता है। क़ुरान कहता है:
    “बेशक अल्लाह ता’आला किसी क़ौम की हालत उस वक़्त तक नहीं बदलता जब तक कि वह अपने अन्दर की हालत न बदलें।” (क़ुरान 13:11)।

    यह आयत न सिर्फ़ ज़ाती (व्यक्तिगत) आदतों बल्कि मुआशरती मयार (सामुदायिक मानकों) को भी बेहतर बनाने के लिए सक्रिय प्रयासों का मुतालबा (आह्वान) करती है। मोमिन (इसके मानने वालों) को यह याद दिलाया जाता है कि वह तब्दीलियाँ इबादत के काम हैं जिनका मक़सद मुआशरे (समाज) की बेहतरी और पाकीज़गी हो।

    Haji Syed Salman Chishty के मुताबिक सूफीवाद स्वच्छता को अंदरूनी (आंतरिक) रूहानी पाकीज़गी (आध्यात्मिक शुद्धता) का अक्स (प्रतिबिंब) मानता है। अजमेर शरीफ के महान संत हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (र.अ.) ने सिखाया कि “इंसानियत की सेवा पूजा का सर्वोच्च रूप है।” इस सेवा में ऐसे माहौल का निर्माण और रख-रखाव शामिल है जो इंसानी वक़ार (मानवीय गरिमा) को बनाए रखते हैं और इल्हामी ख़ूबसूरती (दिव्य सौंदर्य) को दिखाते हैं। पाक-साफ़ (स्वच्छ) और गुलज़ार (हरित) मयारी ज़िंदगी (जीवन स्तर), बहाल (पुनर्वासित) पड़ोस और मुसलसल तरक्क़ी (सतत विकास) सिर्फ सामाजिक पहल नहीं है बल्कि सूफी मार्ग में पाक और पवित्र जिम्मेदारियाँ हैं।

    सूफी मीरास (परंपरा) स्वच्छ और हरित जगहों की शिफयाबी ताक़तों (उपचार शक्ति) पर भी ज़ोर देती है। हज़रत बाबा शेख़ फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर (र) ने समझाया कि क़ुदरत (प्रकृति) ख़ुद इल्हामी (ईश्वरीय) रहम का इज़हार (अभिव्यक्ति) है, और इसके साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से रहना अल्लाह की क़ुदरत का सम्मान करना है।

    इस्लामी रिवायात (Islamic tradition), सूफी आक़ाओं की हिकमत और इल्म (ज्ञान) से मालामाल (समृद्ध) है, जो इस्लामी परंपरा पाकीज़गी और स्वच्छ जीवन के लिए एक मजमूयी नज़रिये (समग्र दृष्टिकोण) का मुतालबा (आह्वान) करती है। कुशादा (विशाल), सर-सब्ज़ (हरित) और साफ़ माहौल (स्वच्छ वातावरण) को अपनाकर, झुग्गियों की बहाली (पुनर्वास) करके और जीवन के उच्च मानकों को बढ़ावा देकर, हम अल्लाह, खुद और मुआशरे (समाज) के लिये अपना फ़र्ज़ (कर्तव्य) पूरा करते हैं।

    Haji Syed Salman Chishty कहते हैं- “हमें याद रखना चाहिए कि अपने घरों, सड़कों या पड़ोस को साफ करने की हर छोटी कोशिश रज़ा-ए-इलाही (ईश्वरीय प्रसन्नता) के क़रीब एक क़दम है। आइये हम सब्र और ईमान के साथ रुकावटों का मुक़ाबला करते हुए बेहतरी के लिए तब्दीली या बदलाव को क़ुबूल करें। सफ़ाई दर हक़ीक़त (वास्तव में) विश्वास का आधा हिस्सा है, और इसके ज़रिये हम उस ज़ात (अल्लाह) के करीब आते हैं जो हर चीज़ में पाकीज़गी और फ़ज़ीलत (उत्कृष्टता) को पसंद करता है।”

    अल्लाह हमें इस ज़मीन (पृथ्वी) के निगहबान (संरक्षक) बनने और तमाम मखलूक़ात की देखभाल करने के मुक़द्दस क़रीज़े (ऋण) को निभाने की हिदायत फरमाए। आमीन।

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