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    Karnataka SIR में 1.1 करोड़ से ज्यादा मतदाता रिकॉर्ड हटाए जाने का दावा, 62 लाख नाम ‘Permanently Shifted’ श्रेणी में; प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल

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    बेंगलुरु: कर्नाटक (Karnataka) में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता रिकॉर्ड हटाए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित ASDDO सूची—Absent, Shifted, Duplicate, Dead and Others—में शामिल नामों और उनके वर्गीकरण को लेकर राजनीतिक एवं नागरिक स्तर पर पारदर्शिता की मांग की जा रही है।

    SIR- ASDDO List 2026 | Kolar district, Government of Karnataka | India

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, Karnataka में SIR प्रक्रिया के दौरान 1.1 करोड़ से अधिक मतदाता रिकॉर्ड हटाए जाने की बात सामने आई है। इनमें करीब 62 लाख मतदाताओं को ‘Permanently Shifted’, लगभग 14.4 प्रतिशत को ‘Deaths’ और करीब 15 प्रतिशत को ‘Untraceable’ श्रेणी में रखा गया बताया जा रहा है।

    सबसे बड़ा सवाल करीब 62 लाख ‘Permanently Shifted’ मतदाताओं को लेकर है।

    क्या 62 लाख मतदाता वास्तव में स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए?

    ‘Permanently Shifted’ का अर्थ सामान्य तौर पर ऐसे मतदाता से है, जो अपने पुराने पते से स्थानांतरित होकर किसी नए पते पर रहने लगा हो और वहां उसका मतदाता पंजीकरण हो गया हो।

    ऐसे में सवाल उठता है कि इन करीब 62 लाख मतदाताओं में से कितने लोगों के नए पते पर मतदाता के रूप में नाम दर्ज होने की पुष्टि की गई? क्या उनके नए पंजीकरण या वैध EPIC नंबर के आधार पर कोई क्रॉस-चेक किया गया?

    यदि किसी मतदाता को ‘Permanently Shifted’ घोषित करने से पहले नए स्थान पर उसके पंजीकरण की पुष्टि नहीं की गई, तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसके नाम को हटाने का आधार क्या था।

    फॉर्म जमा करने वाले मतदाताओं के नाम भी सूची में होने का दावा

    इस पूरी प्रक्रिया को लेकर Karnataka में सबसे गंभीर चिंताओं में से एक कुछ मतदाताओं द्वारा किए गए दावे हैं।

    कई मतदाताओं का कहना है कि उन्होंने अपने BLO से Enumeration Form प्राप्त किया, उसे सही तरीके से भरा, व्यक्तिगत रूप से जमा किया और ऑनलाइन सबमिशन भी पूरा किया, लेकिन इसके बावजूद बाद में उनका नाम ASDDO सूची में दिखाई दिया।

    कुछ परिवारों का दावा है कि स्थानीय स्तर पर उन्हें यह बताया गया कि प्रक्रिया पूरी करने के लिए समय-सीमा और निर्धारित डेडलाइन का पालन करना था।

    यदि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, तो यह जांच का विषय बनता है कि क्या ये केवल व्यक्तिगत या तकनीकी त्रुटियां हैं अथवा सत्यापन प्रक्रिया में कोई व्यापक समस्या रही है।

    ASDDO सूची की जांच करना भी आसान नहीं

    मतदाताओं के सामने एक और चुनौती ASDDO सूची को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सूचियां कई PDF फाइलों और अलग-अलग Google Drive लिंक के माध्यम से उपलब्ध हैं।

    ऐसे में मतदाता के लिए केवल EPIC नंबर, नाम या सीरियल नंबर डालकर अपना रिकॉर्ड खोजने की सुविधा उपलब्ध न होने की स्थिति में सत्यापन मुश्किल हो सकता है।

    खासकर बुजुर्ग मतदाताओं, सीमित डिजिटल सुविधा वाले लोगों और लंबी PDF फाइलों में नाम खोजने में असमर्थ नागरिकों के लिए यह प्रक्रिया और कठिन हो जाती है।

    ‘ड्राफ्ट रोल का इंतजार करें’—क्या नागरिक पर बढ़ रहा है सत्यापन का बोझ?

    कुछ मतदाताओं के अनुसार उन्हें सलाह दी जा रही है कि वे ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होने का इंतजार करें और उसके बाद दावा या आपत्ति दर्ज कराएं।

    यहीं से एक अहम सवाल सामने आता है—यदि किसी नागरिक ने पहले ही निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना फॉर्म जमा कर दिया है, तो उसके नाम को मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए दोबारा यह साबित करने की जिम्मेदारी उसी नागरिक पर क्यों आए?

    मतदाता अधिकारों से जुड़े जानकारों के अनुसार, ऐसी स्थिति में प्रक्रिया की पारदर्शिता और नागरिकों के लिए आसान सत्यापन व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

    चुनाव आयोग से उठ रहे ये अहम सवाल

    पूरे मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कई सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं:

    1. किसी मतदाता को ‘Permanently Shifted’ घोषित करने से पहले कौन-से दस्तावेज या प्रमाण आवश्यक थे?

    2. क्या यह जांच की गई कि संबंधित मतदाता ने वास्तव में किसी दूसरे पते पर नया मतदाता पंजीकरण कराया है?

    3. क्या BLOs पर निर्धारित समय-सीमा या किसी प्रकार के लक्ष्य का दबाव था, जिससे सत्यापन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी?

    4. नागरिकों के लिए EPIC नंबर, नाम या सीरियल नंबर से ASDDO सूची में अपना रिकॉर्ड खोजने की एक केंद्रीकृत और searchable व्यवस्था क्यों नहीं उपलब्ध कराई गई?

    5. करीब 62 लाख ‘Permanently Shifted’ मामलों में से एक स्वतंत्र और यादृच्छिक ऑडिट कराकर यह जांच क्यों न की जाए कि वर्गीकरण सही तरीके से हुआ या नहीं?

    पारदर्शी प्रक्रिया ही भरोसा मजबूत करेगी

    मतदाता सूची का शुद्धिकरण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मृत, डुप्लीकेट या वास्तव में स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अपडेट करना आवश्यक है। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि वास्तविक और पात्र मतदाता गलती से सूची से बाहर न हो जाएं।

    कर्नाटक में ASDDO सूची को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान केवल दावों और आरोपों से नहीं, बल्कि स्पष्ट आंकड़ों, सत्यापन के प्रमाण, पारदर्शी प्रक्रिया और नागरिकों के लिए आसान अपील व्यवस्था से होना चाहिए।

    अब सबसे अहम सवाल यही है—इन लाखों नामों को हटाने की प्रक्रिया में सत्यापन किस स्तर तक हुआ और कितने मामलों में ‘Permanently Shifted’ होने की स्वतंत्र पुष्टि की गई?

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