Mahakumbh 2025: 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने अखाड़ा प्रणाली की शुरुआत की। इसके तहत शस्त्र और शास्त्र दोनों विद्यायों में निपुण लोगों को शामिल करके एक संगठन बनाया गया। इन साधुओं को धर्म रक्षक या ‘नागा साधु’ कहा गया। नागा साधु या नागा बाब भगवान शिव के अनुयायी होते हैं जिनके पास तलवार, त्रिशूल, गदा, तीर धनुष जैसे हथियार होते थे। नागा साधुओं को अक्सर महाकुंभ, अर्धकुंभ, या सिंहस्थ कुंभ में देखा जाता है, क्या है नागा साधुओं की पूरी कहानी? शैव परंपरा और आदि शंकराचार्य ने कैसे तैयार की थी ये सेना। बिना कपड़ों के क्यों रहते हैं नागा बाबा और आखिर कुंभ ख़त्म होने के बाद कहां चले जाते हैं सारे के सारे नागा साधु। ।सब बताएंगे विस्तार से
एक किताब आई थी द नागा वॉरियर्स, लेखक हैं अक्षत गुप्ता। उस किताब ने नागा परंपरा को समझने में आसानी पैदा कि, किताब के अनुसार, आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए केवल साधारण सैनिक नहीं, बल्कि वैदिक सैनिक तैयार किए। ऐसे सैनिकों का एक संगठन बनाया गया, जिनके पास धर्म के अलावा कोई और विरासत नहीं थी। उनके एक हाथ में वेद, गीता, उपनिषद और पुराण थे, तो दूसरे हाथ में भाला, तलवार और कृपाण। यानी आदि गुरु शंकराचार्य ने ऐसे साधु-सैनिकों का एक संगठन बनाया, जो साधु भी थे और सैनिक भी। इन्हें ज्ञान देना और प्राण लेना, दोनों का अभ्यास था। उन्होंने नागाओं को बाहरी आक्रमण से उनके पवित्र धार्मिक स्थलों, धार्मिक ग्रंथों और आध्यात्मिक ज्ञान की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी। जिनका गठन भारत देश की संस्कृति और सभ्यता के गठन के लिए किया गया था। इन्हीं योद्धा साधुओं को का नाम पड़ा ‘नागा’। जिन्हें बोलचाल में नागा साधु,नागा बाबा भी कहा गया। प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में नागा बाबा आकर्षन का बड़ा केन्द्र बने हुए हैं। भभूत लगाई हुई तस्वीर, अस्त्र-शस्त्र से करतब दिखाते हुए बाबा।।।शिव की अराधना में लीन, गंगा में रोज़ाना की डूबकी, निर्वस्त्र या समूजे शरीर पर सिर्फ़ लंगोट का कपड़ा मंज़ूर करने वाले नागा बाबा। धर्मों के जानकार और पीठाधिश बताते हैं कि संतों को 13 अखाड़ों में सात अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं। ये अखाड़े- जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा होते है। नागा साधु बनने का रास्ता कठिन और 12 साल लंबा होता है।।।नागा साधुओं के पंथ में शामिल होने की प्रक्रिया में लगभग छह साल लगते हैं।।।इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूं ही नग्न यानी दिगंबर रहते हैं।
आपको बताते चलें कि अखाड़े में प्रवेश के लिए सबसे पहले उसे लंबे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में जीवन बिताना होता है।।।इसके बाद उसे ‘महापुरुष’ और फिर ‘अवधूत’ की उपाधि मिलती है। श्रीदिगंबर को पूरी तरह नग्न रहकर अपने जीवन का गुज़ारा करना होता है। इसके बाद इन्हें पांच गुरु भगवान शिव, भगवान विष्णु, शक्ति, सूर्य और श्री गणेश स्वीकारने होते हैं। इसके बाद नागा साधुओं के बाल मुंडवाए जाते हैं, और कुंभ के दौरान उन्हें गंगा नदी में 108 डुबकियां लगानी पड़ती हैं।जिसके बाद नागा का दर्जा दिया जाता है। अंतिम प्रक्रिया महाकुंभ के दौरान पूरी होती है। आपको यहां एक मोटी बात बता दें कि प्रयागराज में दीक्षा लेने वाले बाबाओं को नागा का दर्जा मिलता है।
एक और फैक्ट जानते चलिए कि – अर्धकुंभ 6 साल पर लगता है, कुंभ 12 साल पर और किसी 12 बार कुंभ का चक्र पूरा होता है तो महाकुंभ लगता है। मतलब 1 कुंभ 12 साल पर और 12 बार का कुंभ यानी 12 गुने 12 साल 144 साल।।।समझिए कि महाकुंभ 144 साल पर लगता है। केवल प्रयागराज में लगता है और साल 2025 का जो कुंभ है वो महाकुंभ ही है। ये संयोग 144 साल बाद लौटा है। नागा बाबा की सिद्धि महाकुंभ में पूरी होती है। इसलिए भी अबके महाकुंभ में नागा बाबाओं की तादाद लाखों में वहां पहुंची है।
अब ये सवाल भी मन में हिलोरे लेता होगा कि आखिर कुंभ के बाद अचानक से सारे नागा बाबा कहां गायब हो जाते हैं।।।तो आपको बताते चलें कि – अमूमन जंगल, गुफा या हिमालयों पर रहने वाला नागा बाबा कुंभ ख़त्म होते ही वापस से वहीं लौट जाते हैं। नागा संन्यासी किसी एक गुफा में कुछ साल रहते है और फिर किसी दूसरी गुफा में चले जाते हैं। इस कारण इनकी सटीक स्थिति का पता लगा पाना भी मुश्किल होता है। एक से दूसरी और दूसरी से तीसरी इसी तरह गुफाओं को बदलते और भोले बाबा की भक्ति में डूबे ये नागा जड़ी-बूटी और कंदमूल के सहारे पूरा जीवन बिता देता हैं। कई नागा जंगलों में घूमते-घूमते सालों काट लेते हैं और अगले कुंभ या अर्ध कुंभ में नजर आते हैं। नागाओं की दुनिया रहस्यमयी भी मानी जाती है। कहा जाता है कि नागा साधु जंगल और वीरान रास्तों में डेरा डालते हैं। रात में यात्रा और दिन में जंगल में आराम करने के कारण सिंहस्थ में आते या जाते हुए ये किसी को नजर नहीं आते हैं। मगर जैसे ही कुंभ या अर्धकुंभ आता है। वो मेले में अखाड़ा से हज़ारों की संख्या में शामिल होने आते हैं।
8वीं शताब्दी से शुरू हुई ये परंपरा आज भी अपने गौरवशाली इतिहास को निरंतर आगे बढ़ा रही है।


