The 131st Amendment Bill, 2026: यह लगभग शुरू से ही स्पष्ट था कि तथाकथित महिला आरक्षण विधेयक (Women’s Reservation Bill) पारित नहीं हो पाएगा। लोकसभा में इसे संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 (The Constitution (131st Amendment) Bill, 2026) के रूप में पेश किया गया, जिसे पारित करने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। सत्ता की गणित में पारंगत और परिणामों को प्रभावित करने में सक्षम सरकार को यह भली-भांति ज्ञात था कि आवश्यक संख्या उसके पास नहीं है। इसके बावजूद 16 से 18 अप्रैल 2026 के बीच विशेष सत्र बुलाकर इसे पेश करना अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
भाजपा जानती थी कि केरल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में उसकी स्थिति मज़बूत नहीं है। वहीं, उसे विश्वास था कि असम में हिमंत बिस्वा सरमा दोबारा जीत सकते हैं। असली लक्ष्य पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की मज़बूत स्थिति को कमजोर करना था। विशेष सत्र ऐसे समय बुलाया गया जब पश्चिम बंगाल में चुनाव का पहला चरण 23 अप्रैल और दूसरा 29 अप्रैल को होना था। इससे तृणमूल कांग्रेस के प्रचार अभियान पर असर पड़ना तय था, क्योंकि विपक्ष अपने सांसदों की अनुपस्थिति का जोखिम नहीं उठा सकता था। एनडीए के 293 सांसद होने के बावजूद, उसे कुल 298 वोट ही मिल सके, जिनमें वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के 4 वोट भी शामिल थे।
इस पराजय ने भाजपा को यह कहने का अवसर दिया कि कांग्रेस और विपक्ष ने महिलाओं को 2029 के लोकसभा चुनावों में 33 प्रतिशत आरक्षण से वंचित कर दिया। प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्र के नाम संबोधन में यही आरोप लगाया। विधेयक में लोकसभा की कुल संख्या 850 प्रस्तावित की गई थी, जो वर्तमान 543 सीटों से 33 प्रतिशत अधिक है। भाजपा को लगा कि यह मुद्दा चुनावी प्रचार में एक प्रभावी हथियार बन सकता है, खासकर विपक्ष को महिला-विरोधी साबित करने के लिए।
हालांकि, यह एकमात्र कारण नहीं था। यदि भाजपा किसी तरह दो-तिहाई बहुमत जुटाकर विधेयक पारित करवा देती, तो इसके दूरगामी राजनीतिक लाभ होते। 850 सीटों वाली लोकसभा के लिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन (delimitation) आवश्यक होता। इसके लिए अलग से परिसीमन विधेयक भी लाया गया। जम्मू-कश्मीर और असम में हुए परिसीमन से यह स्पष्ट है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से पक्षपाती हो सकती है।
पहले पारित 128वें संविधान संशोधन विधेयक में यह प्रावधान था कि 2026 के बाद जनगणना होगी और उसके आधार पर परिसीमन करके 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। लेकिन भाजपा ने इस प्रक्रिया को लागू करने के बजाय नया विधेयक लाकर स्थिति बदलने की कोशिश की।
हम जानते हैं कि जनसंख्या वृद्धि हिंदी पट्टी के राज्यों में दक्षिणी राज्यों की तुलना में अधिक रही है। यदि भविष्य में सीटों का निर्धारण नई जनगणना के आधार पर होता, तो इससे उत्तर भारत के राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलता और दक्षिणी राज्यों का प्रभाव कम हो जाता। इससे संघीय ढांचे (federalism) पर भी असर पड़ता।
यदि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन होता, तो प्रत्येक राज्य में सीटों में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि होती। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जातीं, जबकि उत्तर प्रदेश की 80 से बढ़कर 120 हो जातीं। इससे दोनों राज्यों के बीच अंतर और बढ़ जाता।
भाजपा का उद्देश्य स्पष्ट था—हिंदी पट्टी में अपनी मजबूत स्थिति का लाभ उठाकर लंबे समय तक राजनीतिक बढ़त बनाए रखना। यह विपक्ष के लिए एक स्थायी चुनौती बन जाता।
इस विधेयक के गिरने के बाद अब 106वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 के अनुसार 2026 के बाद जनगणना आवश्यक है। लेकिन आशंका है कि भाजपा 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने की कोशिश कर सकती है, जिससे एक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो सकता है।
इस बीच, पश्चिम बंगाल में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की बड़ी तैनाती और केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
स्पष्ट है कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर कई महत्वपूर्ण संघर्ष अभी बाकी हैं।
— कपिल सिब्बल
(वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सदस्य)
“यह 27 अप्रैल 2026 को ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित मूल लेख का हिंदी अनुवाद है।”


