Sheila Dikshit: दिल्ली विधानसभा चुनाव होने में बस एक दिन बाकी है। 5 फरवरी को एक ही चरण में सभी 70 सीटों पर वोट डाले जाएंगे और 8 फरवरी को नतीजे आएंगे। लेकिन बात जब दिल्ली की कि हो और दिल्ली के शिल्पकार की बात ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसे में अज हम बात करेंगे शीला दीक्षित की। पंजाब की बेटी, यूपी की बहू लेकिन दिल्ली की सियासत में धूम मचा दी थीं। जिनके नाम दर्ज है देश के किसी भी राज्य में सबसे लंबे वक्त तक मुख्यमंत्री रहने वाली महिला का रिकॉर्ड। लगातार तीन पूर्ण कार्यकाल। उनके कार्यकाल के 15 वर्षों को अगर दिल्ली की राजनीति का शीला दीक्षित युग कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस वीडियों में आपको और जानकारी देंगे लेकिन उससे पहले आप हमारे चैनल द हिंदी टॉप को subscribe करें बेल आइकन दबाना ना भूलें ताकि आपतक पहुंचे हर खबर सबसे पहले
साल 1998 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 में से 52 सीटों पर जीत हासिल की। पिछले चुनाव में उसे सिर्फ 14 सीटें मिली थीं। दूसरी तरफ, 1993 में उनचास सीट जीतकर दिल्ली की सत्ता में धमाकेदार दस्तक देने वाली बीजेपी 5 साल बाद ही लुढ़कर 15 सीटों पर सिमट गई। शीला दीक्षित ने कमाल कर दिया था। चुनाव से ठीक पहले सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाने का बीजेपी का दांव ध्वस्त हो चुका था। शीला दीक्षित के सिर दिल्ली के मुख्यमंत्री का ताज सजा। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने फिर 2003 और 2008 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी जीत हासिल कर इतिहास रचा। मुख्यमंत्री के तौर पर शीला दीक्षित के लगातार 15 वर्ष के कार्यकाल पर ब्रेक तो लग गया लेकिन उन्होंने इतिहास रच दिया था। देश में सबसे ज्यादा वक्त तक मुख्यमंत्री रहने वाली महिला का रिकॉर्ड उनके नाम हो चुका था।
शीला दीक्षित का सियासी सफर बहुत ही दिलचस्प रहा। शीला दीक्षित मूल रूप से पंजाब के कपूरथला की रहने वाली थीं। उनका जन्म 31 मार्च 19 सौ अड़तीस को हुआ था। दिल्ली से पढ़ाई-लिखाई हुई। 1962 में उन्होंने यूपी के उन्नाव के रहने वाले IAS अफसर विनोद दीक्षित से शादी की। दीक्षित परिवार का सियासत से पुराना नाता था। शीला दीक्षित के ससुर उमा शंकर दीक्षित जवाहरलाल नेहरू के करीबी थे। 1971 में वह इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री बने और बाद में कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के गवर्नर भी रहे। शीला दीक्षित का झुकाव भी राजनीति में था और शादी के 7 साल बाद ही 19 सौ उनहत्तर में उन्होंने सियासत में एंट्री कर ली। लेकिन उन्हें बड़ा मौका मिला 19 सौ चौरासी में जब कांग्रेस ने उन्हें यूपी की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा। शीला दीक्षित चुनाव जीत गईं और केंद्र की राजीव गांधी सरकार में राज्यमंत्री भी रहीं। 19 सौ छियासी से 19 सौ नवासी के बीच वो केंद्रीय मंत्री रहीं। दिल्ली के सीएम पद पर लगातार 15 साल रहने के बाद शीला 2014 में केरल की राज्यपाल भी बनीं। हालांकि, वे ज्यादा दिन इस पद पर नहीं रहीं और 6 महीने में ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।
शुरुआत में दिल्ली के लिए ‘बाहरी’ मानी गईं शीला दीक्षित सत्ता संभालते ही राष्ट्रीय राजधानी की सूरत संवारने लगीं। शीला दीक्षित के सीएम कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि दिल्ली की लाइफ लाइन यानी मेट्रो ट्रेन रही है। उन्हीं की देन थी कि दिल्ली में मेट्रो का तेजी से विस्तार हुआ। दिल्ली मेट्रो का निर्माण 1998 में शुरू हुआ और दिसंबर 2002 में पहली बार दिल्ली इस आधुनिक ट्रांसपोर्ट का गवाह बनी। आज करीब 350 किलोमीटर लंबे नेटवर्क के साथ दिल्ली मेट्रो दुनिया की टॉप 10 मेट्रो सर्विसेज में शुमार है।
उन्होंने दिल्ली में सीएनजी बसों के बेड़े को उतारा। 70 से ज्यादा फ्लाईओवर का निर्माण किया। उनके समूचे पहले कार्यकाल और दूसरे कार्यकाल के शुरुआती वर्ष में भी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए की सरकार थी। इसके बाद भी कभी भी ‘दिल्ली बनाम केंद्र’ जैसी सूरत नहीं बनी। वह चुपचाप और ईमानदारी से दिल्ली की सूरत बदलने में लगी रहीं। हालांकि, उनके आखिरी कार्यकाल में 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले ने उनकी छवि को चोट पहुंचाया।
2013 में दिल्ली के विधानसभा चुनाव ऐसे वक्त में हुए जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार का दामन भ्रष्टाचार के आरोपों से लगातार दागदार हो रहा था। हर दिन करप्शन की खबरें सुर्खियों में रहती थीं। शीला दीक्षित को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई और इस तरह दिल्ली में शीला दीक्षित युग का अंत हो गया। एक साल बाद 2014 में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए को लोकसभा चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा और तब से वह सत्ता से बाहर है।


