बॉम्बे हाईकोर्ट ने Adani के खिलाफ याचिका लगाने वाले याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका को निराधार बताया और कहा कि याचिकाकर्ता की कही गई बाते एक ‘लापरवाह बयान’ है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक श्रीराज नागेश्वर आप्पुरवार ने अडानी पावर के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। ये याचिका उस कॉनेट्रकट को लेकर थी जो महाराष्ट सरकार ने अडाणी परिवार को दिया है।
याचिकाकर्ता ने कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने की थी मांग
इस कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक 6,600 मेगावाट रिन्यूएबल और थर्मल बिजली की सप्लाई अडाणी पावर को करनी है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल की थी। उसमे इस कॉन्ट्रैक्ट को रद्द करने की मांग की गई थी। नागेश्वर आप्पुरवार ने ये आरोप लगाया था कि कॉन्ट्रैक्ट संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नहीं है। दायर याचिका में याचिकाकर्ता का कहना था कि ये कॉनट्रेक्ट उचित दर पर बिजली का इस्तेमाल करने के नागरिकों के मौलिक अधिकारों यानी फंडमेंटल राइट्स का उल्लंघन करता है।
याचिका पूरी तरह से निराधार- बॉम्बे हाई कोर्ट
याचिका की सुनवाई 16 दिंसबर को हुई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस अमित बोरकर की बेंच ने मामले की सुनवाई की। बेंच ने याचिकाकर्ता की याचिका को पूरी तरह से गलत और निराधार बता दिया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता टेंडर प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे। और उनके पास भ्रष्टाचार और गलत तरीके से टेंडर दिए जाने का कोई सबूत नहीं है। मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट का कहना है कि निराधार दावे किए गए हैं। जिनमें कॉन्ट्रैक्ट को सरकारी अथॉरिटीज से जुड़ा घोटाला बताया गया है।
याचिकाकर्ता ने दिया कोई भी तथ्य- बॉम्बे हाई कोर्ट
अदालत ने कहा कि इस याचिका की बारीकी से जांच करने पर इसमें आरोपों को पुष्ट करने वाला या समर्थन करने वाला कोई भी तथ्य नहीं मिला है। इस याचिका में केवल निराधार और अस्पष्ट आरोप हैं। अदालत ने आगे कहा कि हमारे विचार से हमें इन पर विचार करने के लिए प्रेरित नहीं करता है। इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाते हुए याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने ये भी कहा कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ भी बिना किसी स्पोर्टिंग मेटेरियल के भ्रष्ट आचरण के इल्जाम लगाए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता कॉन्ट्रैक्ट की निविदा प्रक्रिया में भागीदार नहीं था। याचिका में कोई भी पुष्ट और सहायक कंटेंट नहीं है और इसमें बिल्कुल बेबुनियाद और अस्पष्ट आरोप हैं।
याचिकाकर्ता ने अमेरिकी कोर्ट का दिया था रेफरेंस
याचिकाकर्ता ने अमेरिका के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के एक दस्तावेज का रेफरेंस दिया था। कोर्ट ने कहा कि यह दस्तावेज अमेरिका के किसी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दायर किए गए आरोपों से संबंधित मालूम होता है। बेंच ने कहा कि कोई भी दस्तावेज आधिकारिक हलफनामे के रूप में पेश नहीं किया गया है। कोर्ट ने दस्तावेज को अपर्याप्त मानते हुए खारिज कर दिया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने PIL पर सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को सार्वजनिक हितों पर आधारित वास्तविक जनहित याचिकाओं पर विचार करना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि खराब याचिकाओं से बचने की सावधानी भी बरतनी चाहिए।
6 सप्ताह के भीतर देना होगा जुर्माना
अदालत ने कहा कि इस याचिका की बारीकी से जांच करने पर इसमें आरोपों को पुष्ट करने वाला या समर्थन करने वाला कोई भी तथ्य नहीं मिला है। बल्कि इसमें केवल निराधार और अस्पष्ट आरोप हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने याचिकाकर्ता को ये आदेश दिया कि छह सप्ताह के भीतर जुर्माने की राशि महाराष्ट्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के पास जमा करानी होगी।


