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    जस्टिस Shekhar Yadav के खिलाफ लाया गया महाभियोग, जानें कैसे हटाएं जाते हैं जज?

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    इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस Shekhar Yadav चर्चा में हैं। Shekhar Yadav का 34 मिनट का एक भाषण सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

    Shekhar Yadav अपने भाषण में मुसलमानों को सीधा टारगेट कर रहे हैं। उन्होंने मुस्लमानों को कठमुल्ला बताया और यहां तक कह डाला कि कठमुल्ले देश के लिए खतरा है। उन्होंने आगे कहा कि ये जनता को बहकाने वाले लोग हैं। Shekhar Yadav के इस बयान का कई नेता, वकील और बुद्धिजीवी आलोचना कर रहे हैं। साथ ही इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि एक मौजूदा जज का ऐसे कार्यक्रम में शामिल होना कितना उचित है।

    कपिल सिब्बल ने लाया महाभियोग का प्रस्ताव

    उनकी इसी टिप्पणी को लेकर विवाद सिर्फ सोशल मीडिया तक ही महदूद नहीं रहा। मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि अब विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस भेज दिया है। इस नोटिस पर राज्यसभा के 55 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की अगुआई में सदन के सेक्रेटरी जनरल को ये नोटिस सौंपा गया है।

    संविधान के इस नियम के तहत लाया जाता है महाभियोग

    आपको बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 124 (4) (5), 217 और 218 में जजों को हटाने की पूरी प्रक्रिया का जिक्र है। इसके तहत किसी भी जज को हटाने के लिए सबसे पहले संसद में नोटिस देना पड़ता है। यह नोटिस संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में की जा सकती है। लोकसभा में महाभियोग का नोटिस देने के लिए 100 या इससे अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। वहीं, राज्यसभा में 50 या इससे अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। नोटिस के बाद अगर लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के सभापति इसे नामंजूर कर दें तो जज को हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती है।

    तीन समिति करती है जांच

    नोटिस स्वीकार होने पर सदन के चेयरमैन या स्पीकर तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं। समिति आधार की जांच करते हैं जिसके तहत जज को हटाने की मांग हो रही होती है। समिति में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, चेयरमैन या स्पीकर की सहमति से चुने गए एक न्यायविद जांच समिति के मेंबर होते हैं। नोटिस अगर संसद के दोनों सदनों में स्वीकार होता है तो लोकसभा के स्पीकर और राज्यसभा के सभापति मिलकर जांच समिति का गठन करते हैं।

    महाभियोग पास होने के लिए जरुरी है दो तिहाई बहुमत

    संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के मुताबिक जज को हटाने की प्रक्रिया एक ही शर्त पर आगे बढ़ती है। जब इस प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों में से बहुमत का समर्थन मिलता है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों की दो तिहाई संख्या से कम नहीं होनी चाहिए। जज को हटाने की सारी प्रक्रिया अगर पूरी हो जाती है, तो ये प्रस्ताव राष्ट्रपति के भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही जज को हटाया जाता है।

    4 जजों के खिलाफ लाया गया है महाभियोग

    आपको बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी जज को हटाने की मांग हुई है। साल 1991 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी रामास्वामी को पद से हटाने के लिए महाभियोग लाया गया था। जांच समिति ने भी उन्हें दोषी पाया था लेकिन महाभियोग प्रस्ताव को पर्याप्त सांसदों का समर्थन नहीं मिल सका और यह प्रसताव गिर गया।

    सिक्किम हाई कोर्ट के जज पीडी दिनाकरन के अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के ख़िलाफ़ भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी। जज पीडी दिनाकरन मामले में पर्याप्त सांसदों का समर्थन नहीं होने की वजह से प्रस्ताव गिर गया। वहीं, जस्टिस सौमित्र सेन मामले में महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा में काफ़ी समर्थन मिला था। लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले ही जस्टिस सौमित्र सेन ने इस्तीफ़ा दे दिया।

    साल 2015 में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस पार्दीवाला के खिलाफ भी महाभियोग लाया गया था। साल 2015 में ही मध्य प्रदेश के हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेले को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। लेकिन राज्य सभा की जांच समिति ने उन्हें क्लीन चिट दे दी।

    आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ 2016 और 2017 में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी। लेकिन जांच समिति के गठन से पहले ही दोनों ही बार इस प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला। अब देखना दिलचस्प होगा कि संसद में जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ लाया गया महाभियोग का प्रस्ताव पास होता है या नहीं।

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