केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि मैरिटल रेप (Marital Rape) को अपराध नहीं बनाया जा सकता है।
केंद्र ने कहा कि शादी एक संस्था है और उसे बचाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने दलील दी कि पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं है। मैरिटल रेप (Marital Rape) के मामले को साबित करना भी आसान नहीं होगा और इसके दुरुपयोग किए जाने की संभावना भी है। केंद्र ने कहा कि मैरिटल रेप (Marital Rape) को अपराधीकरण करना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि मैरिटल रेप (Marital Rape) का मुद्दा कानूनी से अधिक सामाजिक है, क्योंकि इसका असर समाज पर सीधा पड़ेगा। केंद्र ने कहा कि इस मुद्दे का समाधान सभी हितधारकों के साथ उचित परामर्श के बिना या सभी राज्यों के विचारों को ध्यान में रखे बिना नहीं किया जा सकता है।
केंद्र ने कहा कि चूंकि मैरिटल रेप (Marital Rape) का मुद्दा शादी से जुड़ा हुआ है, जो कि समवर्ती सूची में है, इसलिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विचार मांगे गए थे। केंद्र ने कहा कि उनके सवाल का जवाब देने वाले 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल दिल्ली, कर्नाटक, त्रिपुरा ने IPC की धारा 375 के तहत वैवाहिक बलात्कार के अपवाद का विरोध किया था। इस अपवाद का समर्थन करने वाले प्रदेश में यूपी, एमपी, गुजरात, असम, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, गोवा और मणिपुर शामिल हैं।
केंद्र ने स्वीकार किया कि विवाह के बाद महिला की सहमति समाप्त नहीं होती है और किसी के द्वारा भी इसका उल्लंघन करने पर सजा मिलनी चाहिए। केंद्र ने आगे कहा कि विवाह के बाद सहमति के उल्लंघन को और विवाह के बिना सहमति के उल्लंघन को एक नजर से नहीं देखा जा सकता है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पति-पत्नी का रिश्ता अनोखा होता है, जो सिर्फ शारीरिक संबंधों तक सीमित नहीं होता। सरकार ने कहा कि अगर संसद ने IPC की धारा 375 में मैरिटल रेप (Marital Rape) को अपवाद माना है, तो अदालत को इसे खारिज नहीं करना चाहिए।
केंद्र ने कहा कि शादी के बाद पति-पत्नी के बीच उचित यौन संबंधों की अपेक्षा होती है। केंद्र ने कहा कि पति को अपनी पत्नी की मर्जी के बिना संबंध बनाने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन, वैवाहिक संबंधों को बलात्कार के समान बताना बहुत कठोर और अनुचित होगा।
केंद्र ने आगे कहा कि संसद ने शादी के भीतर सहमति की रक्षा करने के लिए आपराधिक कानून के प्रावधानों सहित कई उपाय बनाए हैं। IPC की धारा 354, 354A, 354B, 498A और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान करते हैं।


