भारत के रत्न रतन टाटा (Ratan Tata) का निधन 9 अक्टूबर को मुंबई में हुआ। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर देश और दुनिया के तमाम बड़े शख्सियत रतन टाटा को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।
रतन टाटा (Ratan Tata) अपनी जिंदादिली के लिए जाने जाते हैं। रतन टाटा न केवल एक सफल उद्योगपति थे। बल्कि एक दानवीर और परोपकारी भी थे। उनकी दानवीरता की कहानियां तो हम सभी ने सुनी हैं। लेकिन आज हम उनके साहस और हिम्मत की कहानी बताने जा रहे हैं।
रतन टाटा अपने कर्मचारियों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। रतन टाटा (Ratan Tata) ने एक इंटरव्यू में बताया कि साल 1980 के जब वे टाटा संस के चेयरमैन बने थे। चेयरमैन बनने के 15 दिन के बाद ही टाटा मोटर्स के एक प्लांट में हलचल मचने लगी। टाटा मोटर्स के उस प्लांट को बंद करने की नौबत तक आ गई।
दरअसल, कुछ गैंगस्टर टाटा मोटर्स के कारोबार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे। गैंगस्टर कर्मचारियों से रंगदारी मांगना शुरू कर दिए थे। रंगदारी नहीं देने पर गैंगस्टर कर्मचारियों के साथ मारपीट कर रहे थे। इसके कारण कर्मचारी प्लांट पर आना बंद कर दिए थे। गैंगस्टर टाटा मोटर्स के यूनियन पर कब्जा कर कंपनी में कर्मचारियों की हड़ताल करवाना चाहता था।
जब रतन टाटा (Ratan Tata) को इस परिस्थिति के बारे में पता चला तो वह खुद टाटा मोटर्स के प्लांट पहुंच गए। रतन टाटा कई दिनों तक प्लांट में ही रुके। उन्होंने कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि कंपनी उनके साथ है। गैंगस्टर उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। रतन टाटा की कोशिशों की वजह से गैंगस्टर पकड़ा गया। रतन टाटा के इस पहल से कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा और प्लांट पर फिर से काम शुरू हो गया।


