Subodh Kant Sahay: झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Election) को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी (Congress) ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने झारखंड चुनावों के लिए कैंपेन कमेटी का गठन किया है, जिसका अध्यक्ष सुबोध कांत सहाय को बनाया गया है।
झारखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिल भारतीय कांग्रेस ने तीन कमेटियों का गठन किया है। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से बताया गया है, झारखंड कांग्रेस में इलेक्शन कमेटी, सदस्यीय मैनिफेस्टो कमेटी और सदस्यीय कैंपेन कमेटी का गठन किया गया है।
झारखंड इलेक्शन कमेटी के अध्यक्ष केशव कुमार महतो कमलेश बनाए गए है, इनकी टीम में 31 सदस्य होंगे। मेनिफेस्टो कमेटी के अध्यक्ष बंधु तिर्की, इसमें 25 सदस्य होंगे और कैंपेन कमिटी के अध्यक्ष सुबोध कांत सहाय (Subodh Kant Sahay) बनाए गए हैं, कैंपेन कमेटी में 37 सदस्य होंगे।
झारखंड कांग्रेस के सभी विधायक और सभी विभागों के अध्यक्ष इलेक्शन कमेटी और कैंपेन कमिटी के पदेन सदस्य होंगे।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय (Subodh Kant Sahay) को 37 सदस्यों वाली कैंपेन कमेटी की जिम्मेदारी देना इस बात का इशारा है कि आने वाले समय में उनकी भूमिका झारखंड कांग्रेस के लिहाज से और बड़ी हो सकती है। ये माना जा रहा है कि सुबोध कांत सहाय (Subodh Kant Sahay) कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी हो सकते हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय (Subodh Kant Sahay) झारखंड (Jharkhand) की राजनीति में बड़ा चेहरा हैं। वो बीजेपी (BJP) के खिलाफ अपनी बात को मजबूती के साथ रखते हैं। उनकी ये बात कांग्रेस की राजनीति के अनुकूल है। सहाय गांधी परिवार के भी काफी करीब माने जाते हैं।
सुबोध कांत सहाय (Subodh Kant Sahay) झारखंड (Jharkhand) के कद्दावर नेता हैं। पूर्व में उनके पास केंद्र सरकार में अहम मंत्रालय रहे हैं। सुबोध कांत सहाय के पास 2012 तक यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी भी थी।
सुबोध कांत सहाय (Subodh Kant Sahay) को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का करीबी नेता माना जाता है। इसके साथ ही उन्हें कांग्रेस की राजनीतिक लाइन पर चलते हुए लंबा समय हो चुका है।
लेकिन जब बात महागठबंधन की राजनीति की आती है तो मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे उपर हेमंत सोरेन (Hemant Soren) का नाम आता है। इसके साथ ही एक आदिवासी चेहरे की जगह किसी गैर आदिवासी चेहरे को सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करने का दांव फिलहाल तो कांग्रेस नहीं खेल सकती है। लेकिन ये भी सच है कि राजनीति में संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।


